رمیش کنول

رمیش کنول

محبت کا شاعر

#1
dilkash_ghazal_018आँखेँ,_hi
#2
अंधेरों का मैं पैरहन ओढ़ लूँ
#3
अक्षरों से शब्द बेकल हो गए
#4
अगरचे मुझको समर्पित किसी का यौवन था
#5
अन्दर इक तूफ़ान सतह पर ख़ामोशी का पहरा था
#6
अपनी ख़ुशियां सभी निसार करूँ
#7
अपने अपने कान बंधक रख दो, आंखें फोड़ लो
#8
अपनों के दरमियान सलामत नहीं रहे
#9
अब कोई वहशतो-दहशत के ये मंज़र न लिखे
#10
अब तो मैं रोज़ घर में रहता हूँ
#11
अब भी मंजू हसीन लगती है
#12
अभी तक हैं दर-ए अहसास पर लम्हे गिरां कितने
#13
आ गया इन्तख़ाब का मौसम
#14
आँखों से इस्कैन किया
#15
आँखों से कुछ छुपा नहीं रहता
#16
आँखों से जब दूर हुआ
#17
आँच के पास आ गया कोयला
#18
आइये मेहरबां और पास आइये
#19
आईना ये खता नहीं करता
#20
आओ तुम आकर बसा दो मेरे ख़्वाबों के खंडर
#21
आग- पानी के आस पास रही
#22
आगाज़ मुबाइल है अंजाम मुबाइल है
#23
आज भर दीजिये ये मन मेरा
#24
आज भी मेरा दामन खाली, आज भी दिल वीरान
#25
आदमी बुलबुला है पानी का
#26
आप बताएं क्या है सच
#27
आप से मेहरबान का वादा
#28
आपका जो ख़त पढ़ा
#29
आपके हुस्न की लताफ़त हूं
#30
आपको देखा जो मैंने ख़्वाब में
#31
आपको हो नहीं कोई ग़म
#32
आस्थाओं का मुसाफ़िर खो गया
#33
आस्मां से छिन गया जब चांद तारों का लिबास
#34
इक हवेली में बैचैन थे बामो- दर
#35
इक नशा सा ज़हन पर छाने लगा
#36
इशारा,तबस्सुम, नज़ाकत जवानी
#37
इस दौर के भारत का अंदाज़ अनूठा है
#38
ईंट गारे का था हमारा घर
#39
ईश्वर अंश भला इंसान
#40
उजाले बांटने जो चल पड़े हैं
#41
उनसे मिल कर भाव विह्वल हो गए
#42
उभरेगा कभी जो है अभी डूबता चेहरा
#43
उमीदों की बस्ती सजी, तुम न आये
#44
उलझनों के गांव में दुश्वारियों का हल भी है
#45
उलझनों की आंच में तपकर पयम्बर1 बन गये
#46
उसकी सारी ख़ूबियाँ ख़ुद जलवागर करता रहा
#47
उसके तन में बसी हुई ख़ुशबू
#48
उसको चिंता रहती है बस अपने मान और शान की
#49
उसे शुह्रतों की हवा लगी, तभी चार दिन में बहक गया
#50
एक औरत ही आदम की तक़दीर थी
#51
एक पल नहीं लगता उनको रूठ जाने में
#52
एक सुन्दर ग़ज़ल सुनाओ न
#53
ऐ यार मेरे हिज्र के जंगल को जला दे
#54
ऑनलाइन ग़म दिखा
#55
कर के सुमिरन पकाई है रोटी
#56
करता आया अब तक पाप
#57
करुं न गिला
#58
कहीं ऐसा न हो कि ज़िन्दगी साग़र में ढल जाए
#59
कहीं वहशतनुमां अंगड़ाइयां हैं
#60
क़ुरबत की तल्खियों से पिघलने लगी है शाम
#61
काबे से निकल के भी हैं इक काबे के अंदर
#62
काली रात का टीका चाँद
#63
काविर्शो1 का काफि़ला2 उनकी नवाजि़श3 पर रूका
#64
किनारे खड़ा था भला आदमी
#65
किसी की आंखों में बेहद हसीन मंज
#66
किसी के लिये आशिकी है मुहब्बत
#67
कुर्सियाँ हैं कहाँ फैला अख़बार है
#68
कैसी बंदिश है कोई भी पसे-मंज़र न लिखे
#69
कोई दरवेश ये कह कर गया है
#70
कौन कहता है ये झमेला है
#71
कौन चाहेगा तुम्हें आफ़ात में
#72
क्या कशिश थी तेरे बहाने में
#73
खुशियों का दीदार है औरत -
#74
खूबसूरत लगा चांद कल
#75
खैरियत रुखसत हुई
#76
ख़्वाबों के दरीचों से न अब रूप दिखाओ
#77
गगन धरती की मैं हलचल रहा हूँ - Copy
#78
गमले में तुलसी जैसी उगाई है ज़िन्दगी
#79
गर्दिश से निकल आया है किस्मत का सितारा -
#80
ग़म तेरा मुझे अपनों का अहसास दिलाये
#81
गाँव ने दो गज़ की दूरी मान ली
#82
गुज़़रे मौसम का पता सुर्ख़ लबों पर रखना
#83
गुलबदन पर निख़ार का मौसम
#84
घटा कर वो क़ीमत बताता रहा
#85
घर के बाशिंदों की अनबन बढ़ गयी है
#86
घर ग़रीबों का महल हो ये कहाँ मुमकिन है
#87
घरों में और बाहर देखते हैं
#88
चल बात कर
#89
चले आओ
#90
चाँद हुआ है रिश्तेदार
#91
चिराग़ों को है आज आंधी का डर
#92
छोड़ कर चल गयीं जहाँ फ़ानी
#93
जब उदासी ने मेरे घर का ठिकाना ढूंढ़ा
#94
जब कोरोना की सुई भली आ गयी
#95
जब ज़ुल्फ़ तेरी मुझ पे बिखरती नज़र आये
#96
जब तेरी बंदगी नहीं होती
#97
जब फेंके कोई मुझ पे तेरे नाम का पत्थर
#98
जब भी मिलता है कोई शख़्स अकेला मुझको
#99
जब भी मैं उससे मिलने की लेकर दुआ गया
#100
जब समुन्दर में सूरज कहीं सो गया
#101
जब से इस दिल को भा गयी मिटटी -
#102
जब से वह हो गई इक छैल छबीले से अलग
#103
जब से वो बाज़ार गया
#104
जल गये यादों के बामो-दर धूप में
#105
जलसों में झूठा बोले
#106
ज़ख़्म पर ज़ख़्म वह नया देगा
#107
जामुन की शाख़ पर क भी झूला न डालिए
#108
जामो-सुबू1 यूं ही नहीं ठुकराये हुये हैं
#109
जिस तरफ़ सब गए
#110
जिसे हमने फेंका उठाया भी है
#111
जि़ंदगी इन दिनों उदास कहॉ
#112
जी हुजूरी करो
#113
जुनू हूं, आशिक़ी हूं
#114
जुनूं की वादियों से दिल को लौटाना भी मुश्किल है
#115
जुर्म का इक़रार कर लूँ मुझको हिम्मत हो गयी
#116
जुर्म है इश्क़ तो हां इसका खतावार हूं मैं
#117
जो अब तक न पाया वो सब चाहिए
#118
जो पल गुज़र गए उन्हें मुड़कर न देखिये
#119
जो पागल कर दे वो अंगड़ाइयां हैं - Copy
#120
जो समर्पित थे कल तक बदलने लगे
#121
जोबन के दरीचो पे कोई परदा नहीं था
#122
झूमती हर सुबह की खूं में नहाई शाम है
#123
टूटे हुये तारे का मुकद्दर हूं सद1 अ फ़्सोस2 - Copy
#124
ठुकराओगे तो सोच लो पछताओगे बेशक - Copy
#125
ठोकर में डाल कर ये ज़माने की दौलतें - Copy
#126
डट के पीछे मेरे पड़ा है कोई - Copy
#127
डिजिटल करे पढ़ाई ग़म- - Copy
#128
डूबने वालों में उसका नाम है - Copy
#129
तन की ख़्वाहिश मन की लगन को सू-ए-हवस1 ले जायेगी - Copy
#130
तन की हसरत में अब उबाल नहीं - Copy
#131
तबलीगी जमाती हैं तो जाहिल नहीं होंगे - Copy
#132
तरन्नुम की मलिका से जिसने निबाही - Copy
#133
तुझे मैं ख्वाबों का अलबम दिखा नहीं पाया - Copy
#134
तुम हमारे न हुए,कोई हमारा न हुआ
#135
तुम ही कहो बढ़ जाती है क्यों बरसातों में दिल की जलन
#136
तुमसे मिलने का इरादा - Copy
#137
तुमसे मैं मुझसे आशना तुम हो
#138
तुम्हारी यादों का सिलसिला हो
#139
तुम्हारे लफ़्ज़ों को भावनाओं की पालकी में बिठा रहा हूँ
#140
तू उधर था, इधर हो गया
#141
तेरी यादों के दस्तावेज़ अल्बम से निकल आए
#142
तेरे ख़त जब भी मेरे नाम आए
#143
तेरे बिस्तर पे कोई सोता है
#144
तेरे वस्ल की शोख़ चाहत से पहले
#145
थी भीड़, एहतियात का गुलशन कहाँ मिला
#146
दर्द का लश्कर उधर तैयार है
#147
दर्द की धुन पर ग़ज़ल है
#148
दर्द की भाषा पढ़ो
#149
दरख़्त फूल समर डाली शादमाँ देखूं
#150
दस्ते क़ातिल बेहुनर है आजकल
#151
दाल रोटी और दवाई के सिवा क्या चाहिए
#152
दिन को दिन लिखना, रात मत लिखना
#153
दिन से डर कैसा हसीं रात से जी डरता है
#154
दिल का मकान ग़म ने किराये पे ले लिया
#155
दिल का मौसम ,तेरी गलियां,दिन सुहाने सोचकर
#156
दिल की दुनिया हो गई जे़रो-ज़बर1
#157
दिल की बस्ती में लूट पाट न कर
#158
दिल बड़ा बेक़रार रहता है
#159
दीवारों में दर होता है
#160
दुज़दीदा निगाही से नहीं कोई शिकायत
#161
दोस्त आओ तो सही
#162
धर्म संसद में शुरू हुईं गालियाँ
#163
ध्वंस का वंध्याकरण अब कीजिए
#164
न कोई लाल-ओ-गौहर देखते हैं
#165
न चुप रह
#166
न जो मिला वो ख़्वाब है
#167
नगर, गांव, बस्ती जलाने से बचिए
#168
नशे में चूर होना चाहती है
#169
ना-कर्दा गुनाहों की सज़ा काट रहे हैं
#170
नाम यश डिग्री पता मान गए
#171
नाम हूँ मैं , मेरा पता तुम हो
#172
निगाहों में बसी है तेरी मूरत
#173
नुक्रई1 उजाले पर सुरमई अंधेरा है
#174
नज़र से आरती तेरी उतारूं
#175
पत्थरों को आइना दिखला रहा है कोई शख़्स
#176
पलक झुका कर हामी भर
#177
पहरे मंदिर पर देखो
#178
पहुँच इक मुश्ते-खाकी1 की सितारों के जहां तक है
#179
पाँच जी की ही चल रही है हवा-
#180
पाँव बुजुर्गो के दाबे
#181
पैरों में मेरे फर्ज की जंजीर पड़ी है
#182
प्रश्न हूं मैं, हल नहीं हूं
#183
फूल की पंखडियों को मसलेंगे
#184
फूल को ख़ुशबू , सितारों को चमन हासिल हो
#185
फूल ख़ुशबू से समाहित हो गए
#186
बड़े ही खूबसूरत हैं बड़े प्यारे, मज़े के दिन -
#187
बदतर ही हालत किया
#188
बदला बदला सा है मेरा दफ़्तर -
#189
बरसों बाद ज़मानत पर है आई ग़ज़ल --
#190
बल खाती मछलियां हैं, सफ़र चांदनी का है
#191
बांहो में समुन्दर के दरिया का सिमट जाना
#192
बात दिलबर की दिलकशी की है
#193
बारिश में भीगते हुये पास आया चल दिया
#194
बाग़ में मिली बहार
#195
बिखरी हुई हयात1 से सिमटे लिबास थे
#196
बे हद मालामाल हुआ
#197
बेटियों की बहुत ज़रूरत है
#198
बेटी पर सख्ती, बेटों को मस्ती के त्यौहार मिले
#199
बेहुनर को सिखाया हुनर
#200
बड़ी आसान क़िस्तों में चुका है
#201
भूल जाओ गया सो गया
#202
मजदूरों के लिए कोई लारी न आएगी
#203
मदिरा छलकाने आई
#204
मये-गुलरंग1 का क़सूर नहीं
#205
मुक़द्दर का सूरज घटाओं में था
#206
मुजरिमों से मिले रह गए
#207
मुझको निहारते रहे सामान की तरह
#208
मुझसे मिल के वो क्यों इतना गदगद हुआ
#209
मुझसे मिलता है अजनबी की तरह
#210
मुझे ज़िन्दगी ने लुभाया बहुत
#211
मुद्दतों बाद तेरी याद सुहानी आई
#212
मुफ़्त मिली पहचान नहीं हूं
#213
मुस्कराउंगा, गुनगुनाउंगा
#214
मेरा हमनवा नहीं है
#215
मेरी आँखों में आ गए आँसू-
#216
मेरी ग़ज़लों की रानी है जो उसकी बात ही क्या है
#217
मेरी पलकों पे तेरे ग़म खज़ाने निकले
#218
मेरी सदाओं का सूरज बुझा बुझा सा था
#219
मेरे घर आई ख़ुशी -
#220
मेरे दोस्त पल में ख़फ़ा हो गये
#221
मेरे मंसूब होने के क़िस्से
#222
मेरे सर की क़सम खाने लगा है
#223
मेरे हमसफ़र
#224
मै शहर मे पत्थर के हूं इक पैकरे-जज़्बात
#225
मैं अपने होंठों की ताज़गी को तुम्हारे होंटों के नाम लिख दूँ
#226
मैं यजमान जबसे बना हूं
#227
मैं समुंदर हूँ मुझको नदी चाहिए
#228
मोहब्बतों के सफ़र में थकान थोड़े है।
#229
मौज में आज है जलपरी
#230
मौत की दहशत छाई है
#231
मौत है नग़मासरा अब ज़िन्दगी ख़ामोश है
#232
मौन हो
#233
ये न कहिये भला नहीं होता
#234
ये सच है कि सर धड़ से मेरा दूर हो गया
#235
रंग उसका उड़ गया
#236
रंगरलियाँ वो मनाने को तहख़ाने में मिले
#237
रंजिशें उभरीं तअल्लुक़ 1 के सभी दरपन चनक कर रह गये
#238
रहबरे - क़ौम, रहनुमा तुम हो
#239
रात का क़िस्सा कहानी आधी रात
#240
रात दिन उसको सोचना क्या है
#241
राज़ जो दिल में है चेहरे पे छुपाते क्यों हो
#242
रिश्ते रिसते रह जाते हैं
#243
रिश्तों को मिस्मार किया
#244
रिश्तों में पहले जैसी तमाज़त नहीं रही
#245
रेत में कोई धार पानी की
#246
रोज़ डूबे हुये सूरज को उगा देती है
#247
रोज़ सोते हैं जाग जाते हैं
#248
लगता है कुछ अच्छा दिल+
#249
लफ्ज़ मैं और तुम मआनी हो
#250
लमहाते- शाख़े-वक़्त ने क़ादिर बना दिया
#251
लम्स1 की आंधियों से जो डर जायेंगे
#252
लिबासे- जि़ंदादिली1 तार तार था कितना
#253
लफ़्ज़ बरते गए सलीक़े से
#254
वह जो लगता था पयम्बर इक दिन
#255
वो जो घर था, तुम से ही था वो घर, तुम्हें याद हो कि न याद हो
#256
वो रह - रह के अब याद आने लगे हैं
#257
वो रूखे -शादाब है और कुछ नहीं
#258
शरीके ज़िन्दगी हूँ
#259
शहर दर शहर भर गया पानी
#260
शह्र से लाज का अपहरण हो गया
#261
शाम हुई क़िस्तों में बिखरते सूरज का मंज़र1 उभरा
#262
शुक्रिया
#263
श्याम की टोली हो जा तू
#264
समुन्दर में बेचैन हैं मछलियाँ
#265
सरस्वती वंदना
#266
सर्द है रात, सुलगती हुई तन्हाई है
#267
सवाल आँखों से कर रहा हूँ, जवाब पलकों से दे रही है
#268
सहमी सहमी हुई तस्वीर लिये बैठे हैं
#269
साजन से मिल आई धूप
#270
साथ चलने की तमन्ना दिल में है
#271
सामने तुम हो, सामने हम है, बीच में शीशे की दीवार
#272
साहिबा को सलाम है साहिब
#273
सितारों भरा जग दुलारा गगन-
#274
सिर्फ़ अदहन में है उबलती आग -
#275
सुनहरी यादों के जंगल में खो गई होगी
#276
सुनी है सभी की मगर की है मन की
#277
हट उधर चल
#278
हम खाक नशीनों को अब आराम नहीं है
#279
हर आदमी दुख दर्द में ग़लतां1 नज़र आया
#280
हर ऑफिस में एक सा मंज़र
#281
हर दम दिल के आंगन मे ली गम ने ही अंगड़ाई
#282
हर पल संवरने सजने की फुरसत नहीं रही
#283
हर शहर गाँव कसबे पे यूँ मेहरबां हुआ
#284
हरी पत्तियों पर फिसलती रही
#285
हवा की चिराग़ों से है दोस्ती
#286
हुनर पैरवी का सिखाते हमें
#287
हुस्न है दिलकश तबाही इश्क़ को मंजूर है
#288
है बात जब कि जलती फ़ज़ा1 में कोई चले
#289
है मुहब्बत जो तेरे दिल में वही इस दिल में है
#290
हैं अपने सम्बन्ध यथावत
#291
होंठों पर पहरे हैं
#292
हौसलों के नगर में रहे
#293
क़र्फ़्यु लगा है रात में बाहर न जाइए
#294
क़ह्क़हों के दिए जलाओ न
#295
क़ाफ़ियों के पहरे में शे'रियत बरसती है
#296
ख़त्म बेटों का फ़ोन आना हुआ
#297
ख़ुदा के दर पे मैं अपनी इबादतें रख दूँ
#298
ख़ुशनुमा लमहों के पंछी छत बदलते ही रहे
#299
ग़म के दस्तरख्वान पर ख़ुशियाँ सजा सकता हूँ मैं
#300
ग़म छुपाने में वक़्त लगता है
#301
ग़म बिछड़ने का नयन सहने लगे
#302
ग़रीब लोगों की जां का मुआवज़ा क्या है
#303
ज़रा ज़रा सी बात पर वो मुझसे बदगुमां रहे
#304
ज़रुरियात की फ़ेहरिस्त वह दिखाता है
#305
ज़हन की शाख़ पर ख्वाब फलते रहे
#306
ज़िन्दगी नाहक उदासी भर नहीं
#307
ज़िन्दगी ये चार दिन की एक दिन भाया उन्हें
#308
ज़ुल्फ़ गालों पे बिखरने को ग़ज़ल कहते हैं
#309
फ़िक्र मेरी ले के शुहरत पा रहा है
#310
फ़्लैट पर धूप आती नहीं