#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'160
तू उधर था, इधर हो गया
ख़ूबसूरत सफ़र हो गया
आंख नम हो गई क्यों तेरी
क्या कोई दर बदर हो गया
चांदनी खिड़कियों पर मिली
चांद आशुफ़्ता सर हो गया
बेबसी बेरुख़ी बन गई
जब से मैं मो'तबर हो गया
मुझ पे उसका करम है 'कँवल'
वो मेरा हम सफ़र हो गया