Back to List

वो रूखे -शादाब है और कुछ नहीं

रमेश 'कॅंवल' की दिलकश ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल@रमेश ‘कँवल’278
वो रूखे -शादाब है और कुछ नहीं
ये दिले-बेताब है और कुछ नहीं
गौहरे-नायाब1 है और कुछ नहीं
जि़ंदगी इक ख़्वाब है और कुछ नहीं
हर वरक़2 में क़ैद हैं रानाइयां 3
मुज्तरिब 4 इक बाब 5 है और कुछ नहीं
मछलियों पर खिलखिलाती चांदनी
हमनवां 6 तालाब है और कुछ नहीं
जिस्म की हर शाख पर अठखेलियां
जुर्रते-महताब7 है और कुछ नहीं
महफि़ले-रूखसारो-लब8 में दिलरूबा
बस मेरा आदाब है और कुछ नहीं
शबनमी चादर लपेटे मौज में
इक गुले-शादाब9 है और कुछ नहीं
तेरे मिलने का हसीं, मंजर 'कँवल’
सुबह का इक ख्वाब है और कुछ नहीं