#ग़ज़ल@रमेश ‘कँवल’288
फ़ऊल फ़ैलुन फ़ऊल फ़ैलुन फ़ऊल फ़ैलुन फ़ऊल फ़ैलुन
सवाल आँखों से कर रहा हूँ, जवाब पलकों से दे रही है ख़मोशियों की मुहर लगाकर, शराब नज़रों से दे रही है मुहब्बतें जो यूँ ही लुटा दें अदावतों से कहाँ है हासिल इसीलिए तो ये रहनुमाई सिला दुआओं से दे रही है इनाम पता न गूगल को लफ़्ज़ हैं जो पुकारती है उन्हीं से मुझको ज़माना जिसको समझ न पाए वही इशारों से दे रही है जो धड़कनों में मचल रहा है उसी मुहब्बत को भूल जाऊं शिकस्त खाकर ग़मों से मुझको सदा सलीबों से दे रही है न बालकोनी में कोई पंछी, न हैं कबूतर किसी भी छत पर पयाम गमले की सब्ज़ पत्ती उदास आँखों से दे रही है अना के एहसास की हवेली, हवस में डूबी, मज़ा नदारदये दावतें दे रही है लेकिन पराये जूड़ों से दे रही है सफ़र में बिछड़ा है वो तभी से अज़ाब झेला है हमने तनहा विसाले-यारां 'कँवल' ख़ुशी बस कुछ एक लमहों से दे रही है