#ग़ज़ल@रमेश ‘कँवल’008
अपनों के दरमियान सलामत नहीं रहे
दीवार-ओ-दर मकान सलामत नहीं रहे
नफ़रत की गर्द जमअ निगाहों में रह गई
उल्फ़त के क़द्रदान सलामत नहीं रहे
यूँ अख्तलाफ़ बढ़ गया क़ौमों के दरम्यान
मिल्लत के सायबान सलामत नहीं रहे
रोशन हैं आरज़ू के बहुत ज़ख़्म आज भी
ज़ख्मों के कुछ निशान सलामत नहीं रहे
लौटा रहे हैं लोग पुरस्कार इन दिनों
यानी ये मेहरबान सलामत नहीं रहे
ऐसा नहीं कि सिर्फ़ यक़ीं दरबदर हुआ
दिल के कई गुमान सलामत नहीं रहे
महफ़ूज़ बाम-ओ-दर हैं सदाक़त के आज भी
धोके के पायदान सलामत नहीं रहे
अपनों से अपने लहज़े में बातों का है कमाल
कुछ शख्स बदज़ुबान सलामत नहीं रहे
वो लोग बेअदब थे ‘कँवल’ बेख़ुलूस थे
हम जैसे बेज़ुबान सलामत नहीं रहे
सृजन : 8 नवम्बर,2015
माहनामा जहानुमां,गंगोह,सहारनपुर नवम्बर 2018
रोज़नामा अल हयात,रांची 25 अक्टूबर,2018 पृष्ठ 3
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