#ग़ज़ल@रमेश ‘कँवल’306
हवा की चिराग़ों से है दोस्ती
बहुत मुख़्तसर है मेरी ज़िन्दगी
उमीदों के पर को कतरने से क्या
उड़ानें तो हैं हौसलों पर टिकी
मकानों पे मौसम की तहरीर है
फ़िज़ाओं में हैं तल्खियाँ शोर की
कड़क बिजलियों की है काली घटा
न जाओ,ठहर जाओ,कुछ पल अभी
भला खोने को है मेरे पास क्या
मुझे ज़िन्दगी जब न कुछ दे सकी
अभी तुम नशे में हो कुछ मत कहो
मैं फ़ुरसत में तुम से मिलूँगा कभी
बहुत नर्म लहजे में उसने कहा
‘कँवल’ अब सुनाओ ग़ज़ल प्यार की
सृजन : 11 अप्रैल 2013