#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'069
किसी की आंखों में बेहद हसीन मंज़र था
मेरा बदन था जज़ीरा वो इक समुंदर था
वो जलते पंख लिये बढ़ रहा था मेरी तरफ़
मेरी रगों में ठिठुरता हुआ दिसंबर था
जो एक जुगनू सा बुझता रहा, दमकता रहा
वो अजनबी तो शनासाओं से भी बेहतर था
उदास सूर्यमुखी खो गई थी सूरज में
थकन से चूर मगर रौशनी का बिस्तर था
बराय-नाम तो पानी था उसकी चारो तरफ़
मगर जो ठहरा तो सहरा में वह शनावर था
अजीब बात बताई है जोगनों ने हमें
वो बूढ़ा साधू नहीं खौफ़नाक खंजर था
'कंवल’ थीं तेज हवायें मेरे तआकुब में
मै अपने वक़्त का जलता हुआ कलेंडर था
प्रकाशन : शीराज़ा मार्च 1983
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