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धर्म संसद में शुरू हुईं गालियाँ

रमेश 'कॅंवल' की दिलकश ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'183
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
धर्म संसद में हुईं जब गालियाँ
नफ़रतों के दरमियाँ हैं बस्तियाँ
भीड़ पर यूँ छा रही हैं मस्तियाँ
गालियों पर बज रही हैं तालियाँ
सोचते हैं क़ौमी मिल्लत ये कहाँ
ग़लतियों पर कर रहे गुस्ताखियाँ
लाखों की लाइन में हैं बेरोजगार
रेलवे बरसा रहा है लाठियाँ
फ़ॉलोवर घटने लगे हैं आपके
अब बदलिए आप अपनी नीतियाँ
याद आए फ़ोन विडियो कॉल हो
अब कहाँ आतीं किसी को हिचकियाँ
कौल का मौसम गुज़रते ही 'कँवल'
अंडा देने से ही मुकरीं मुर्गियाँ