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बिखरी हुई हयात1 से सिमटे लिबास थे

रमेश 'कॅंवल' की दिलकश ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'218
बिखरी हुई हयात1 से सिमटे लिबास थे
हम डूबती सदाओं2 के कुछ आस-पास थे
आंखों में अपनी मंज़रे-सद-दस्ते-यास3 थे
हम मौसमे-बहार से यूं रूशनास 4 थे
आया न कोई आशना5 चेहरा ही सामने
हम शहरे-ख्‍़वाबे-ज़ार6 में बेहद उदास थे
रंगीन तितलियों ने लुभाया बहुत मगर
हम पानियों के शहर में टूटे गिलास थे
फैली हुई थी ख़ौफ की इक धुं द चार सू7 जंगल के जानवर भी बहुत बदहवास थे
लम्हों की धूप छांव ने पहचान छीन ली
हम आइनों के गांव में इक देवदास थे।
तुम वहम की गुफाओं में खो जाओगे 'कँवल’
हमको भी सब कहेंगे कि निष् फल प्रयास थे।
1. जीवन 2. आवाज 3. निराशा के जंगल के दृश्य 4. परिचित