#ग़ज़ल@रमेश ‘कँवल’287
सर्द है रात, सुलगती हुई तन्हाई है
दिल के आग़ोश में इक चोट उभर आई है
मेरे महबूब कहां है तू सदा ही दे दे
जिंदगी फिर मेरे माज़ी को पुकार आई है
महो-अंजुम1 की जवानी भी ढली जाती है
आखि़री लौ तेरी उम्मीद को उसकाई है
जुस्तजू2 मेरी ज़मी पर न करो अहले-ज़मीं3
जि़ंदगी मेरी खालाओं के करीब आई है
जख़्म के फूल़ महक उठठे हैं, सागर खनके
साकि़या! जाम, चली यादों की पुरवाई है
जब भी छार्इ है मेरे सर पे मुसीबत की घटा आशना चेहरों ने यक गोना4 जि़या पाई है
ज़ुल्फ़-बर-दोश5 है साक़ी भी घटायें भी हैं रक़्से-मय तेज़ करो जश्न की रात आई है
गर्द राहों की मेरे पांव ने चाटा है 'कंवल’
तब कहीं मंजि़ले-मक़्सूद6 नज़र आई है।