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जल गये यादों के बामो-दर धूप में

रमेश 'कॅंवल' की दिलकश ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'117
जल गये यादों के बामो-दर धूप में
पर सलामत है दिल का खंडर धूप में
हो न जाये कहीं बे असर धूप में
यूं परेशां है रंगे-सहर धूप में
बेख़बर था समुंदर मगर मछलियां
ऐश करती रहीं रेत पर धूप में
फूस की खोलियों में है दहशत बपा
ढूढंता है अमां1 इक शरर 2 धूप में
सुबह से एक साया भटकता रहा
इक दरीचा रहा मुंतज़र3 धूप में
मेरे अहसास4 की तितलियां खो गई
रफ़्ता रफ़्ता 'कँवल' मोतबर5 धूप में।