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ना-कर्दा गुनाहों की सज़ा काट रहे हैं

रमेश 'कॅंवल' की दिलकश ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'190
ना-कर्दा गुनाहों की सज़ा काट रहे हैं
हम आज भी इक दरिया के दो पाट रहे हैं
इन शहर की गलियों मे कहां गांव के सावन
फ़व्वारों के मंज़र मेरा सर चाट रहे हैं
मौसम के बदलते ही बदल जायेंगे हम तुम
गो सच है अभी रंजो- खुश बांट रहे हैं
अब तक न मिली नौकरी कोई भी 'कँवल’ को