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तन की ख़्वाहिश मन की लगन को सू-ए-हवस1 ले जायेगी - Copy

रमेश 'कॅंवल' की दिलकश ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'150
तन की ख़्वाहिश मन की लगन को सू-ए-हवस1 ले जायेगी किस को खबर थी तेरी जुदाई ये दिन भी दिखलायेगी
जनम जनम के साथ का वादा पलक झपकते टूट गया
अब कोई अनजानी गोरी जीवन में रम जायेगी
राधा जिसकी विरह में जीवन भर सुलगी, उस प्रेमी को क्या मालूम था ये दुनिया इक दिन अवतार बनायेगी
हम बेहद मश्कूर2 हैं उसके जो बख्शा है कुदरत ने क्या कीजे उस शै की शिकायत जो न हमें मिल पायेगी
जाड़े के सूरज की तरह अच्छा लगता है रूप तेरा
तेरे रूप की घूप भी लेकिन कब तन मन बहलायेगी
रह न सकी महफ़ूज़3 जहां दो रूहों की पहचान 'कंवल'
वहां बदन की धूप ही कब तक ज़ख़्मों को सहलायेगी