#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'166
मफ़ाइलुन फ़इलातुन मफ़ाइलुन फ़ैलुन
दरख़्त फूल समर डाली शादमाँ देखूं फल / प्रसन्न
मैं बाग़बाँ को गुलिस्ताँ पे मेहरबां देखूं
दुआएं उसकी मेरा सायबान लगती हैं
मैं जब परेशां लगूं साथ अपने माँ देखूं
मैं जंगलों का मज़ा ले रहा हूँ सर्दी में
हवा के काँधे पे सूरज रवां - दवां देखूं गतिशील
मुसीबतों का नगर है तो है मेरा क्या है
बुज़ुर्ग घर में हैं क्यों सू-ए-आसमां देखूं
किसी को रब नहीं दिखता कहीं पे भी लेकिन
बताइये कि मैं रब को नहीं कहां देखूं
फ़साना क़िस्सा कहानी वो चाहे कुछ भी कहें
हमेशा उनमें मैं अपनी ही दास्ताँ देखूं
किसे चुनूं मैं भले लोग भी हैं मुजरिम भी
'कँवल' कशाकशे-दिल है यहाँ वहां देखूं