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इस दौर के भारत का अंदाज़ अनूठा है

रमेश 'कॅंवल' की दिलकश ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'041
मफ़ऊल मफ़ाईलुन मफ़ऊल मफ़ाईलुन
इस दौर के भारत का अंदाज़ अनूठा है
अब रिश्ता अदालत का इंसाफ़ से टूटा है
जो बात नहीं शामिल क़ानून की पुस्तक में
उस पर ही सियासत ने इस देश को लूटा है
मस्ती थी, बहलते थे, सुहबत के उजालों में
अब कैसे बताएं हम क्यूं साथ वो छूटा है
यौवन के दरीचों पर इतरा के वो यूँ बोले
अब फिर न कभी कहना इस शोख़ ने लूटा है
उस हुस्न सिफ़त दिलबर की ऐसी तमन्ना थी
'जब ज़ुल्फ़ संवारी है इक आईना टूटा है'
अफ़वाहों की शहज़ादी कहती है अदालत में
मैं वाक़ई झूटी हूं , सब वाक़िआ झूटा है
अब सोचिए मंदिर या मस्जिद में 'कँवल' जाकर
चौराहे पे आकर क्यों सर आपका फूटा है
सृजन :16 जनवरी,2020
अक़ीदत के फूल : एनीबुक प्रकाशन के पृष्ठ 212 पर प्रकाशित