#ग़ज़ल@रमेश ‘कँवल’303
हर पल संवरने सजने की फुरसत नहीं रही
आंखों को आइने की ज़रूरत नहीं रही
मिलने पे यूँ बिछुड़ने का अहसास ही न था
बिछुड़े तो कभी मिलने की कि़स्मत नहीं रही
आंखों में एडस होने का है खौफ इस तरह
अब बेवफ़ाइ की कोई सूरत नहीं रही
हमदर्दी की वो धूम है राहत की राह पर
'कोसी’ को कोसने में भी लज़्ज़त नहीं रही
अब मुंतजि़र नहीं हूं मैं खिड़की से धूप का
अच्छा है मेरे सर पे कोई छत नहीं रही
लुत्फो-करम है दौलते-इफ्लास का यही
महफिल में मेरी इज़्ज़तो-शोहरत नहीं रही
उसके बदन की गंध मुझे भा गई 'कँवल’