#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'214
बांहो में समुन्दर के दरिया का सिमट जाना
और देख के ये मंज़र तेरा वो क़रीब आना
ले ले के तेरा नाम अब कसते है सभी ताना
तुझ बिन मेरे जीवन का सूना है सनम खाना1
घायल है हर इक ऩग्मा तुम रूठ गये जब से
तुम से है मेरी ख़ुशियां क्यों तुमने नहीं जाना
इमरोज़ के मंज़र पर सद नक़्श हैं माज़ी के
माज़ी से है कैफ़ आगी इमरोज़ का मयख़ाना2
मां बाप की खुशियां थीं राहों में 'कँवल’ अपनी
वरना हमें आता था संसार से टकराना