#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल' 055
फ़ाइलुन मुफ़ाईलुन फ़ाइलुन मुफ़ाईलुन
एक पल नहीं लगता उनको रूठ जाने में
हमको पहरों लगते हैं फिर उन्हें मनाने में
कुछ भला कहाँ होता दिल कहीं लगाने में
फ़ायदा नहीं पर ये तजरुबा बताने में
बेधड़क चला आए हिज्र वो हक़ीक़त है
यार देर लगती है वस्ल को बुलाने में
आप का तो वादा था बात दिल में रक्खेंगे
खुल गयी बताओ फिर, क्या मज़ा छुपाने में
सर बलंद होकर भी वो बहुत पशेमां थे
साज़िशों की दुलहन थी मेरा सर झुकाने में
जब मुआवज़ा लेने हुक्मरान हाज़िर हों
चैन कैसे पाएं वो बस्तियां जलाने में
आबरू किसी की भी लुट न जाए बेमतलब
सहमे - सहमे रहते हैं सब यतीमख़ाने में
आंसुओं की महफ़िल में हुक्म था हँसो गाओ
मुश्किलों का मौसम था लब पे मुस्कुराने में
मौन को मिला ज़िम्मा तर्जुमान करने का