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अक्षरों से शब्द बेकल हो गए

रमेश 'कॅंवल' की दिलकश ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल@रमेश ‘कँवल’014
बह्र - बहरे रमल मुसद्दस महज़ूफ़फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
अक्षरों से शब्द बेकल हो गएप्रीत के मधु गाँव जंगल हो गएख़त्म कर बैठे सकल संवाद हमप्रेम के मृदु याम घायल हो गएछांव में इक पेड़ के बैठे रहे
फिर तथागत यश के पीपल हो गयेएक बाइक पर सिमटते दोस्त दो लम्स के ख़ुशरंग बादल हो गयेदो बदन बांहें गले में डाल करनृत्य रत पांवों की हलचल हो गए
पत्थरों की मानसिकता वालों में
रह के हम भी शीर्ष उप्पल हो गए
दस्तकों से रह के वंचित आज हम
खिडकियों के बंद साँकल हो गए
थे सभी जूते में टाई कोट में
अपनी किस्मत में ये चप्पल हो गए
देशहित की बात करते हम;कँवल; कृष्ण के हाथों के उत्पल हो गए