#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'141
चार दिन की ज़िन्दगी में एक दिन भाया उन्हें
प्यार का मौसम सुहाना याद जब आया उन्हें
दस्तकों और आहटों पर यूँ तो चौकन्ना थे वे
थरथराये पर, दिखा जब मेरा ही साया उन्हें
कौन दिल छोटा करे नाकामियों के गिफ़्ट पर
सोचिये कुछ और बेहतर मन में क्या आया उन्हें
आँख के लाकर में ज़ेवर ख्वाब के कुछ तो रखो
ख़ालीपन के बैंक से दो क़र्ज़ सरमाया उन्हें
जब सलाखों की हिफ़ाज़त में 'कँवल' थीं खिड़कियाँ
प्यार के दर्पण ने उनका हुस्न दिखलाया उन्हें