#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'216
बात दिलबर की दिलकशी की है
गुफ़्तगू इश्क़ की ख़ुशी की है
मस्त आंखें ग़ज़लसरा हैं अभी
दिल ने ज़ाहिर है शायरी की है
मुल्तवी करना उनकी फ़ितरत है
इल्तज़ा दिल ने बारहा की है
राम मंदिर वहीँ बनायेंगे
बात कुछ भी नहीं नई की है
मेरी आराधना , इबादत तू
ज़िन्दगी ! तेरी बन्दगी की है
साल उन्नीसवां लगा है इसे
रात इक्कीसवीं सदी की है
है ख़ुमारी अभी दिसम्बर की
पहली तारीख़ जनवरी की है
हुस्न के पेच-ओ-ख़म कँवल जाने
बिल्शुबहा इश्क़ उसने भी की है
सृजन : 2 जनवरी, 2019
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