#ग़ज़ल@रमेश ‘कँवल’255
ये न कहिये भला नहीं होता
उसके होने से क्या नहीं होता
दिल हज़ारों बवाल करता हैं
तुम सा जब दिलरुबा नहीं होता
सारे हालात के करिश्मे हैं
कोई अच्छा बुरा नहीं होता
उस की बातें भी उसकी जैसी हैं
ये न कहना नशा नहीं होता
ज़िद का बिस्तर समेट लेता है
मेरा दिलबर ख़फा नहीं होता
हौसले मुजरिमों के बढ़ते हैं
जल्द जब फ़ैसला नहीं होता
दिल को दुनिया उजाड़ ही देती
गर तेरा आसरा नहीं होता
छोटा बच्चा सवाल करता है
जल्द क्यों वह बड़ा नहीं होता
दूर रहते हो तुम ख़यालों से
‘जब कोई दूसरा नहीं होता’
लौट आया हूँ चार धाम से मैं
ऐसा पर हादसा नहीं होता
लाश पे लाश और उस पे ‘कँवल’
ऐसा भी रतजगा नहीं होता
सृजन : 22 जून 2013
(35 वीं परिणय वार्षिकी)