#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'181
फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
दोस्त आओ तो सही
कुछ बताओ तो सही
क्यूँ ख़फ़ा रहती हो यूँ
घर बसाओ तो सही
मैं मनाऊं कब तलक
मान जाओ तो सही
लब तबस्सुम से सजा
गुनगुनाओ तो सही
हुस्न के ज़ेवर पहन
मुस्कुराओ तो सही
सादगी की धूप ले
छत पे आओ तो सही
कब 'कँवल' समझोगे तुम
ये बताओ तो सही