#ग़ज़ल@रमेश ‘कँवल’305
हरी पत्तियों पर फिसलती रही
हसीं धूप शाख़ों पे फलती रही
ज्वालामुखी क़हर ढ़ाते रहे
नदी पर्वतों से निकलती रही
वरक़1 दर वरक़ मैं ही रौशन रहा
वो अलब़म पे अलबम बदलती रही
तमाज़त2 अजब नर्म कलियों में थी
हवा पंखा रह रह के झलती रही
किसी दस्तख़त की करामात3 थी
मेरी जिंद़गी हाथ मलती रही
हवस की निगाहें खरीदार थीं
पकौड़ी वो मासूम तलती रही
'कंवल’ इक समुंदर था हैरतज़दा
नदी कैसे उसको निगलती रही