#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'108
जब ज़ुल्फ़ तेरी मुझ पे बिखरती नज़र आये
बिगड़ी हुई तक़दीर संवरती नज़र आये
हौले से सबा1 जब भी गुज़रती नज़र आये तस्वीर तेरी दिल में उतरती नज़र आये
ये मंजि़ले-उल्फ़त2 तो नहीं अहदे-गुज़श्ता3
इक याद थी दिल में जो बिसरती नज़र आये
होटों की हंसी ताज़गी - ए- ज़ख़्म है यारो
दिल में ये छुरी बन के उतरती नजर आये
मलबूसे-मसीहा4 में छुपे बैठे हैं क़ातिल
अब जीस्त5 न क्यों इनसे भी डरती नज़र आये
बख्शी है 'कँवल’ मैंने ग़मे-ज़ीस्त को शोहरत
मै हूं कि हंसी लब पे संवरती नज़र आये