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कर के सुमिरन पकाई है रोटी

रमेश 'कॅंवल' की दिलकश ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल' 061
फ़ाइलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन
कर के सुमिरन पकाई है रोटी
मेरी माँ ने बनाई है रोटी
भाई बहनों ने खाई है रोटी
प्रेम से मुस्कुराई है रोटी
जाने गुजरें यहां से कब सैनिक
भाव विह्वल सजाई है रोटी
कामनाओं की धूम है दिल में
बीबी सज धज के लाई है रोटी
कोई राजा हो या भिखारी हो
सब ने क़िस्मत से पाई है रोटी
यान का हो सफ़र कि पैदल हो
सब की थाली में आई है रोटी
तोड़ने को चला हूँ मैं जो 'कँवल'
जाने क्यों सकपकाई है रोटी