Back to List

अंधेरों का मैं पैरहन ओढ़ लूँ

रमेश 'कॅंवल' की दिलकश ग़ज़लें

हिन्दी اردو English
मुहब्बतों का शायर : रमेश 'कॅंवल'
#ग़ज़ल@रमेश ‘कँवल’003
अंधेरों का मैं पैरहन ओढ़ लूँ
उजालों से दामन बचा के रहूँ
बहुत हैं खिवैया मेरी नाव के
ये कश्ती न डूबे मेरी क्या करूँ
ज़रूरी नहीं रौशनी के महल
मेरे पास आओ मैं लब चूम लूँ
तेरा नाम तेरा पता है जुदा
मेरी ज़िद तुझे शाम तक ढूंड लूँ
नया शहर, पहचान भी है नई
कहाँ उसकी आहट जो दस्तक मैं दूँ
मुझे ज़िन्दगी का सबब मिल गया
‘कँवल’ बेटियों की हिफ़ाज़त करूँ