#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'046
उभरेगा कभी जो है अभी डूबता चेहरा
कंकर न इसे मारो कि है फूल-सा चेहरा
तनवीर1 मिली हर्फे-सियह2 से भी जहां को
कोरा था जो काग़ज़ वो है अब वेद का चेहरा
कुछ धूल भी दरपन पे है लम्हों के सफ़र की
कुछ ग़म की तपिश से भी हुआ सांवला चेहरा
मै पेड़ हूं, दम लेते हैं, सब छांव में मेरी
झुलसे है मगर धूप में तन्हा मेरा चेहरा
अहसास के आंगन में कोई फूल खिला है
आता है बहुत याद 'कँवल’ यार का चेहरा