#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'215
फ़ाइलुन मफ़ाइलुन
बाग़ में मिली बहार
हर तरफ़ दिखी बहार
जिस्म तक रुकी कहाँ
रूह पर टिकी बहार
मुफलिसों के पार्क में
देखिये मिली बहार
प्लास्टिक के शह्र में
आ नहीं सकी बहार
पर्वतों की चोटियों
से फिसल गई बहार
खो गई ज़मीन में
शह्र - गाँव की बहार
अब कँवल न ढूंढिए
स्वर्ग चल बसी बहार