#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'044
मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन फ़ऊलुन
उजाले बांटने जो चल पड़े हैं
मेरे दर पर वो नाबीना खड़े हैं
ये परदे रेशमी तो हैं यक़ीनन
मेरे सपनों के इनमें चीथड़े हैं
हवा लेकर हम आयेंगे सुगन्धित
ये वादा कर गए जो ख़ुद सड़े हैं
किये हैं सर क़लम लाखों का फिर भी
पढ़ा है हमने वो अकबर बड़े हैं
न दूरी है,न मुँह पर मास्क उनके
सभाओं में सियासतदां अड़े हैं
तरक्क़ी कर रहा है मुल्क अपना
हर एक सू मील के पत्थर गड़े हैं
‘कँवल’ महबूब है बाँहों में मेरी
पलक झपके न यूँ नैना लड़े हैं
सृजन - नवरात्र कलश स्थापन 17 अक्तूबर, 2020