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पत्थरों को आइना दिखला रहा है कोई शख़्स

रमेश 'कॅंवल' की दिलकश ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'195
पत्थरों को आइना दिखला रहा है कोई शख़्स
अक्स अपना देख कर घबरा रहा है कोई शख़्स
सर पे है सूरज, हवायें गर्म है, राहें खामोश
जल रहा है और चलता जा रहा है कोई शख़्स
बन संवर कर मुंतजि़र1 हैं मंदिरों मे देवियां
सुबह की किरनें बिखेरे आ रहा है कोई शख़्स
खुश्क लब कांटो का उसको आ गया शायद खयाल
आबला पा2 सू-ए सहरा जा रहा है कोई शख्स
ख्वाहिशों की चिलचिलाती धूप में प्यासा हू मैं जामे-वस्ले-यार कब से पा रहा है कोई शख्स
दो हरे शादाब पत्तों का सिमट कर टूटना भींच कर मुझको सुनाये जा रहा है कोई शख्श
तुम मिलन की रात का मंज़र न खैंचो ऐ 'कँवल’
शर्म से खुद में सिमटता जा रहा है कोई शख़्श