#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'111
जब भी मिलता है कोई शख़्स अकेला मुझको
ज़र्रा-ज़र्रा1 नजर आता है सुनहरा मुझको
तुम उजालों में न दे पाये कभी साथ मेरा
रास आया न कभी आह अंधेरा मुझको
फ़ुरकते-यार2 में आया है वो सैलाबे-हवस 3
आइना आइना हैरत से है तकता मुझको
संग बख़्शी है जिसे शक्ले-हसीं4 आज़र5 ने
बुतपरस्ती 6 का सबक़7 हँस के है देता मुझको
हैफ़ सद हैफ़8 जो ख़ुशियों का समुंदर था कभी
आज वह शख़्स लगा दर्द का सहरा मुझको
हो न हो प्यार के जज़्बे का असर हो ये 'कँवल’
आज वह बुत नजर आता है ख़ुदा सा मुझको