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चिराग़ों को है आज आंधी का डर

रमेश 'कॅंवल' की दिलकश ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'104
चिराग़ों को है आज आंधी का डर
जलें गर न ये तो हो कैसे सफ़र
ये पर्यावरण, ये प्रदूषित नगर
ये स्कूल, बच्चे,सड़क बेशजर
हुआ गर्मियों का सफ़र अब शुरू
अभी से ही ए.सी. हुए बेअसर
ठिकाना,न दाना , न पानी जहां
परिंदों के किस काम के वो नगर
हिमायत का कोई सबब तो नहीं
अगर मंदिरों मस्जिदों से हो डर
दनादन चलीं , धोके से गोलियां
ये विद्या के मंदिर भी हैं पुरख़तर
तुम्हें याद शायद मैं आऊं नहीं
'कँवल' याद आओगे तुम उम्र भर
सृजन 26 फ़रवरी 2018
हिंदी ग़ज़ल का बदलता मिजाज़; पृष्ठ 94
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