Back to List

आईना ये खता नहीं करता

रमेश 'कॅंवल' की दिलकश ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल@रमेश ‘कँवल’016
मुझ को मुझ से जुदा नहीं करता
आईना ये ख़ता नहीं करता
दर्दो ग़म हो कि मौज मस्ती हो
कोई शिकवा गिला नहीं करता
मुंसिफ़ी की नज़र से है वाक़िफ़
‘हो बरी’ इल्तजा नहीं करता
ख़त्म करता हूँ अपनी गुमनामी
शोहरतों का पता नहीं करता
दुश्मनी खुल के वह निभाता है
दोस्त बन कर दग़ा नहीं करता
फ़ासलों से है मुझको फुसलाता
वस्ल का फ़ैसला नहीं करता
रब की मर्ज़ी डुबा दे,पार करे
फ़ैसला, नाख़ुदा नहीं करता
सब नवाज़िश करम बुजुर्गों की
कुछ कोई देवता नहीं करता
रंग में है ‘कँवल’ का रंगे हुनर
इल्म किस का भला नहीं करता
हर मुसव्विर का शाहकार ‘कँवल’
म्यूज़ियम में सजा नहीं करता
सृजन : 17 अप्रैल,2017
दैनिक भास्कर,पटना 8 मई 2017 : पृष्ठ 13 पर प्रकाशित
संवदिया जुलाई-सितम्बर 2018 पृष्ठ 38 पर प्रकाशित