#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'112
जब भी मैं उससे मिलने की लेकर दुआ गया
वह मेरा मुंतजि़र1 था लबे-बाम आ गया
जब तक था आसमान पे रहबर2 की तरह था
टूटा तो फिर खला3 में बिखरता चला गया
बेज़ार4 क्यों न हो कोई दुनिया के दर्द से
क्या कोई ग़म के दश्त5 में खुशियां खिला गया
दामन तेरे़ खयाल ने छोड़ा न एक पल
घबरा के जि़ंदगी से मैं दामन छुड़ा गया
गुंचा दहन तो और भी शादाब6 हो गये
तुझको रूला के कौन हसीं गुल खिला गया।
सूरत तेरी अजीज7 थी जाड़े की धूप सी
सूरज था तू भी जल्द ही पच्छम दिशा गया
पिछले पहर किसी की वो आवाजे-पा8 'कंवल’ मंदिर मे दिल के कौन ये हलचल मचा गया