#ग़ज़ल@रमेश ‘कँवल’266
मफ़ऊलु फ़ाइलातु मफ़ाईलु फ़ाइलुन
रिश्तों में पहले जैसी तमाज़त नहीं रही गर्मी
शक शुब्हा है सभी पे वो चाहत नहीं रही
सच है कि खुल के अपनी अदावत नहीं रही दुश्मनी
पर साथ - साथ रहने में लज्ज़त नहीं रही
दिलकश है हुस्न उनका मैं अब भी जवान हूँ
पर वस्ल के मिज़ाज में उजलत नहीं रही उतावलापन
पहले जो बनते और संवरते थे रात दिन
'टिक टाक' से तो अब उन्हें फ़ुर्सत नहीं रही
जम्हूरियत है कैसी कि 'चुप रह' ये हुक्म है
ताले हैं लब पे इज्ने-समाअत नहीं रही सुनने की अनुमति
कुछ लोग तो कमाते हैं दिन रात बिन थके
कुछ लोगों को कमाने की आदत नहीं रही
पहले जो सुबहो-शाम 'कँवल' मेहरबान थे
उन दोस्तों की हम पे इनायत नहीं रही कृपा