#ग़ज़ल@रमेश ‘कँवल’010
अब कोई वहशतो-दहशत के ये मंज़र न लिखे
किसी स्कूल में बम, गोली कि ख़ंजर न लिखे
कोई भी शय हो उसे जान से बढ़कर न लिखे
अदलिया से है कोई शख़्स भी ऊपर न लिखे
नाख़ुदा है वही जो पार लगा दे कश्ती
जो डुबो दे उसे ये मुल्क शनावर न लिखे
तरबियत ऐसी हो जो क़द्र करे इंसां की
फूल की कोख से पैदा कोई पत्थर न लिखे
मौजे- दरिया में कोई कचरा गिराए न कभी
ज़िन्दगी के लिए तड़पे वो समन्दर न लिखे
जिसने इद्दत से, हलाला से दिलाई है नजात
क्या लिखे कोई जो 'मोदी' को पयम्बर न लिखे
एक अरसा हुआ दफ़्तर ने किया मुझको विदा
अब 'कँवल' को कोई सरकार का चाकर न लिखे