#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'232
मुझे ज़िन्दगी ने लुभाया बहुत
कोई देर तक याद आया बहुत
जुदा हो के गो तिलमिलाया बहुत
तेरे वस्ल पर खिलखिलाया बहुत
न क़ानून का खौफ़ था,नै हया
गुनाहगारों ने क़हर ढ़ाया बहुत
न दस्तार,नै सर सलामत रहा
तमन्नाओं ने वरग़लाया बहुत
बहुत मेहरबां थे सभी रहनुमा
बस इक वर्ग ही उनको भाया बहुत
नहीं थी कोई लहर जिस शख्स की
उसे मीडिया ने दिखाया बहुत
अजब डर लुगाई का बेटे को था
जो उसने पिता को रुलाया बहुत
मुझे आज़माने की फ़ुर्सत कहाँ
मगर आपने आज़माया बहुत
तसव्वुर जुदाई का जब भी हुआ
तेरे वस्ल को गुनगुनाया बहुत
अदालत रसूखों पे चलती रही
उसे मुजरिमों ने छकाया बहुत
फ़क़ीरों की सोहबत मुझे भा गई
कि खोया ज़रा सा तो पाया बहुत
बहुत खूबसूरत थे मिटटी के घर
मगर बारिशों ने गलाया बहुत
वो गालों पे शबनम टपकना ‘कँवल'
मेरी आँखों में झिलमिलाया बहुत
सृजन : 14-16 मार्च 2014 प्रसारण : आकाशवाणी पटना 21 सितम्बर 2015