#ग़ज़ल@रमेश ‘कँवल’300
हर आदमी दुख दर्द में ग़लतां1 नज़र आया
इन्सान से ग़ाफि़ल2 मुझे यज्दां3 नज़र आया
ऐ दौरे-तरक़्क़ी4 तेरी सौगात5 अजब है
जिस चेहरे को देखा वो परेशां नज़र आया
उलझी रही शोलों से हर इक शाखे-निशेमन गुलशन में अजब जश्ने-चिराग़ां6 नज़र आया
तुम साथ थे जब तक ये खुदाई थी मेरे साथ
तुम बदले तो बदला हुआ दौरां नज़र आया
रूस्वा सही, बर्बाद सही, फ़ख़्7 है मुझको
मैं इश़्क के अफ्ऱसाने8 का उन्वां 9 नज़र आया
क्यों रास वफ़ा तुझको न आई मेरे महबूब
क्यों तू मेरी उल्फ़त से गुरेज़ां10 नज़र आया
लाई है हविस मुझको 'कंवल मोड़ पे ऐसे
मैं अपनी मुहब्बत से पशेमां 11 नज़र आया।