#ग़ज़ल@रमेश ‘कँवल’297
सुनी है सभी की मगर की है मन की
है शोहरत बहुत मेरे दीवानापन की
सुलगता रहा आंच पर उसके तन की
नदी खो गई उसमें मेरे बदन की
संभाला,संभल कर ही पहना, उतारा
कहानी है ये जिस्म के पैरहन की
ख़ुशी,नींद,सेहत न भूख उसके वश में
ये औक़ात है दोस्तो ! आज धन की
सियासत मगन है मिले वोट कैसे
किसे फ़िक्र है आज अपने वतन की
एलर्ज़ी मुझे हो गई व्हाटसअप से
है क़ीमत बहुत इसकी चाहत, लगन की
जवानों के सर पर हो पत्थर की बारिश
है कैसी फ़िज़ा जज़्ब-ए-हुब्बुल वतन की
अभी तक कँवल लोभ लालच न छूटा ?
पता है ? ये है उम्र चिंतन भजन की
सृजन : 19 फ़रवरी,2017
क़ौमी तंज़ीम,पटना 24 अक्टूबर 2018
फ़ारूक़ी तंज़ीम,रांची, 26 अक्टूबर 2018
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