#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'152
करोना ने जमकर मचायी तबाही
इलाही, इलाही, इलाही, इलाही
सभी को है फ़ुर्सत मिलन पे मनाही
है बेचैन मन बंद है आवाजाही
मिली महफ़िलों में उसे वाहवाही
तरन्नुम की मलिका से जिसने निबाही
लबों पर तबस्सुम की कलियाँ सजी हैं मुस्कराहट
दिलों में मसर्रत की है बादशाही प्रसन्नता
चमकता है सर पर सफ़ेदी का सूरज
मेरे बालों पर अब नहीं है सियाही
शबे-वस्ल होंठों पे है ‘जाने दो’ पर
‘नज़र और कुछ दे रही है गवाही’
गुनाहों की मस्ती में हलचल मची है
कि ड्रग क्या पता लाए कितनी तबाही
बड़े लोग झुकते हैं मिलने की ख़ातिर
भरे है गिलासों को जैसे सुराही
‘कँवल’ इन दिनों फ़िक्रे- दहकाँ में गुम हैं किसानों की चिंता
दलालों में है ख़ौफ़े-ज़िल्ले- इलाही शासन (बादशाह) का भय