#ग़ज़ल@रमेश ‘कँवल’296
सुनहरी यादों के जंगल में खो गई होगी
वो गुज़रे लम्हों की चौखट पे सो गई होगी
मैं अपनी जि़द के दरीचे से झांकता ही रहा अना1 के मोड़ से वापस वो हो गई होगी
दराज़ बाहों के पिंजडे़ में तड़फड़ाती गई
वो देवदासी दुपटटा भिगो गई होगी
ये सोच कर कि इक स्पर्श में मिटा देगा वो एक मौज किनारा डुबो गई होगी
मुझे भी नीला समुंदर निगल रहा है 'कंवल’
वो चांदनी भी जज़ीरों2 में खो गई होगी