#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'098
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन
घर के बाशिंदों की अनबन बढ़ गयी है
रेशमी पर्दों की उलझन बढ़ गयी है
स्वाद में आने लगी है उम्दगी कम
बर्तनों की जब से खनखन बढ़ गयी है
मुफ़लिसों की अर्जियाँ मायूस हैं अब
पैरवी - रिश्वत की अकड़न बढ़ गयी है
इन दिनों तारी है फैशन का नशा यूँ
जिस्म से कपड़ों की उतरन बढ़ गयी है
अर्श पर है अब अमेज़न का प्रलोभन
शहर के बिज़नेस की फिसलन बढ़ गयी है
मंच पर दूल्हे के खेमे में है हलचल
अब लिए जयमाल दुल्हन बढ़ गयी है
जब से आने का किया है उसने वादा
क्यों 'कँवल' के दिल की धड़कन बढ़ गयी है
रमेश 'कँवल'