#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'138
फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन
ज़हन की शाख पर ख्वाब फलते रहे
वो दरीचे पे दिल के टहलते रहे
हमसफ़र बन के तुम साथ चलते रहे
देख कर ये जहाँ वाले जलते रहे
हौसलों के दिए रख हथेली पे हम
डगमगाते रहे और सँभलते रहे
बन के सूरज रहे हार मानी नहीं
रोज़ उग़ते रहे ,रोज़ ढलते रहे
रूह को चैन फिर भी नहीं मिल सका
जिस्म की हम रिदाएँ बदलते रहे
तय नहीं कर सके क्या करें क्या नहीं
फ़ैसले हुक्मरानों के टलते रहे
अब सड़क पर ही आईन बनने लगा
सांसद देश के हाथ मलते रहे
मुफ़लिसों को ‘कँवल’ घर नहीं मिल सका
मौसमों-से ठिकाने बदलते रहे