#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'085
दिल में जब नफ़रत हुई
खैरियत रुख़्सत हुई
बंद दरवाज़े हुए
बरहना वहशत हुई
एक लम्हे की खता
सदियों की शामत हुई
ज़हन की दीवार पर
मुख्लिसी की छत हुई
इत्र के बाज़ार में
फूलों की शोहरत हुई
जमअखोरी जब बढ़ी
दाल की क़िल्लत हुई
सारे मज़हब अड़ गए
शांति रुख़्सत हुई
तुम नसीबों से मिले
ज़िन्दगी जन्नत हुई
चलना ट्राफ़िक जाम में
अब ‘कँवल’ आदत हुई
सृजन : 8 नवम्बर 2015
दैनिक भास्कर,पटना : 13जून 2016 :
साहित्य –पृष्ठ 11
एवं संदल सुगंध भाग 4 (2017) पृष्ठ 38पर प्रकाशित
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