#ग़ज़ल@रमेश ‘कँवल’259
रंजिशें उभरीं तअल्लुक़ 1 के सभी दरपन चनक कर रह गये
रूत मुलाक़ातों की आई, दो हसीं चेहरे बढ़े, लेकिन झिझक कर रह गये
काली रातें ओढ़कर सोने लगे जब दो बदन, आई बहार
पत्तियों की ओट में खिलते हुये दो गुल दमक कर रह गये
आबशारे-दश्त2 में धोकर सुनहरा जिस्म इक महवश3 उठा और फिर हम डूबते सूरज की राहों में भटक कर रह गये
हौसलों के पांव थे , बेरोज़गारी की सुलगती रेत थी
बेबसी की धुंद में तुम खो गये, हम भी भटक कर रह गये .
हादिसों की जर्बे-पैहम4 ने बना डाला हमें बेजानो- बेहिस आईना
वक़्त का चेहरा भयानक था मगर हम भागते कैसे चटक कर रह गये
शहर की बाहों में पलती सभ्यता बतलायेगी कि गांव की सादगी और प्यार किस झुरमुट में किस डर से दुबक कर रह गये
जब खि़रद5 की धूप में जलने लगे ख़्वाबे-सहर6 दिल के 'कँवल' हम सकुते-दश्त7 बन बैठे, जुदार्इ में सनक कर रह गये
1. संबंध 2. जंगली झरना ,जल प्रपात 3. चांद के समान (प्रेयसी)