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क़ह्क़हों के दिए जलाओ न

रमेश 'कॅंवल' की दिलकश ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'073
क़ह्क़हों के दिए जलाओ न
एक दिलकश ग़ज़ल सुनाओ न
जो परेशान कर दे नज़रों को
वैसी दस्तक को भूल जाओ न
ज़िद के कपड़ों में दफ़्न तो न करो
मैं क़रीब आया,तुम भी आओ न
तन की ख़ुशबू से मन बहकता है
मन न बहके वो कर दिखाओ न
सारे मुद्दे भुला के बैठ गए
इस सियासत पे मुस्कुराओ न
और बांटो हमारे कुनबे को
अपने कुनबे के गीत गाओ न
घर निगाहों में और सफ़र में क़दम
कैसी उलझन है, कुछ बताओ न
तुम से मिलकर ही चैन मिलता है
ऐरे ग़ैरे से अब मिलाओ न
बेसबब हैं,फ़िज़ूल हैं ख़ुशियाँ
तुम ‘कँवल’ जाओ,जाओ,जाओ न
सृजन : 13 अक्टूबर,2015
नवरात्रि कलश स्थापन
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