#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'094
गुज़़रे मौसम का पता सुर्ख़ लबों पर रखना
अपनी आंखों में मेरे क़ुर्ब का मंज़र रखना
तुम गये साल महीनों को संजो कर रखना
याद आयेगी मेरी, याद बराबर रखना
बंद करना न तअल्लुक़ के दरीचे को कभी
तुम मुलाक़ात के आंगन को मुनव्वर रखना
अपनी सांसों में बसा लेना वफ़़ा की ख़ुशबू
अपने जूड़े को गुलाबों से मुअ़त्तर रखना
एक दस्तक तुम्हें चौंकाती रहेगी अक्सर
इक दिया दिल के धरौदें मे जलाकर रखना
मेरे हिस्से में तबाही की घनी तल्ख़ी है
तुम लबे-शीरीं के अमृत को बचाकर रखना
एक जलता हुआ सूरज है मेरी ज़ात में क़ैद
तुम भी लहराता हुआ तन का समुन्दर रखना
गर्द जिस पर न महो-साल की जमने पाये
दिल की दीवार पे इक ऐसा कलेन्डर रखना
वो उभर आयेगी हाथों की लकीरों मे 'कँवल'
उस के मिल जाने का अहसास बराबर रखना
प्रकाशित : सनद अंक 8 2002
मिर्रिख फ़रवरी 2003
युगीन नवम्बर 2003
सुखनवर 11-12 /2010
डॉ. दुर्गेश उपाध्याय द्वारा यूट्यूब पर गाई गई विडिओ अपलोड
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