#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'161
मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन फ़ऊलुन'हसीब सोज़' को याद करते हुए “तेरे ख़त जब भी मेरे नाम आए"मेरी मुठ्ठी में चारों धाम आएहुकूमत से जो भी इनआम आएग़रीबों के न कोई काम आएकिए सब राज़ अफ़शां आंसुओं नेदिले- आशुफ़्ता पे इल्ज़ाम आए।सवेरे से लगे थे दिल में मेले ढली जब शाम तिश्नाकाम आएशिकन बिस्तर की ख़ामोशी में गुम हैन जाने तन को कब आराम आएतसव्वुर में हमारे साथ हो तुम हक़ीक़त में कभी वह शाम आए इन आंखों ने किया जब तब इशारा शिगुफ़्ता लब के भी पैग़ाम आए
पवनसुत ने सुनाई राम धुन क्या लगा सीता को उनके राम आए
तरक़्क़ी के 'कॅंवल' दीपक जलाकरकिसी रहबर के सर इल्ज़ाम आए
9-9-2023