#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'019
फ़ाइलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन
आँखों से कुछ छुपा नहीं रहता
इनको क्या क्या पता नहीं रहता
होंठों पर हर निगाह रहती है
लफ्ज़ लब पर सजा नहीं रहता
बादलों के सितम की क्या कहिये
शह्र अच्छा - भला नहीं रहता
अब मुसाफ़िर शजर तलाश करें
शम्स अब ख़ुशनुमा नहीं रहता
आज सूरज ने सबको समझाया
अब्र का दबदबा नहीं रहता
बादलों और हवा की दहशत से
आसमां कब डरा नहीं रहता
बिजलियाँ सर पे जब 'कँवल' चमकें
मौत का कुछ पता नहीं रहता